देओल परिवार नहीं बना पाए लोगों को दिवाना, ‘यमला पगला दीवाना’ का नहीं चला जादू

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नई दिल्ली: देओल परिवार के लिए यह झटका ही कि एक बार फिर से लोगों की पंसद पर पूरा परिवार नहीं उतर पाए। साल 2011 में रिलीज फिल्म ‘यमला पगला दीवाना’ मनोरंजन का एक बंपर धमाका था लेकिन इसके बाद जो भी इस फिल्म की सीरिज बनी वो कुछ खास नहीं कर सकी।

बॉक्स ऑफिस पर नहीं चली फिल्म यमला पगला दीवाना

हालांकि एक ही परिवार के तीन अलग-अलग पीढ़ियों वाले इन कलाकारों को सिनेमाई परदे पर एकसाथ देखना अनूठा अनुभव था। साथ ही एक कॉमेडी फिल्म के जरिए दर्शकों को हंसाने के साथ रोमांचित करने का काम ‘यमला पगला दीवाना’ में किया था। लेकिन साल 2013 में ‘यमला पगला दीवाना 2’ आई तो कुछ खास चली नहीं। और अब देओल परिवार लेकर हाजिर है फिल्म ‘यमला पगला दीवाना फिर से’। तो बात ऐसी है कि इस बार भी मामला कुछ खास जमा नहीं।

ऐसी है फिल्म की कहानी

फिल्म शुरू होती है इस जानकारी के साथ कि किस तरह भारतीय आयुर्वेद के नुस्खों से तैयार वज्र कवच नामक एक औषधि से बादशाह अकबर की नपुंसकता से लेकर महारानी विक्टोरिया के पिंपल्स तक सही हो गए थे। इसके बाद कहानी पहुंचती है आज के पंजाब में, जहां वैद्य पूरन सिंह (सनी देओल) अपने पूर्वजों की धरोहर वज्र कवच के जरिये गरीब मरीजों का इलाज करते हैं। इस वज्र कवच पर कई फार्मास्यूटिकल कंपनियों की नजर है। ऐसी ही एक कंपनी का मालिक मार्फतिया (मोहन कपूर) किसी भी कीमत पर यह फॉर्मूला हासिल करना चाहता है। वह पूरन को उसके भाई काला (बॉबी देओल) के जरिये पैसों का लालच देता है, पर उसकी दाल नहीं गलती। उल्टा ढाई किलो का हाथ उसका एक दांत जरूर तोड़ देता है। इस बेइज्जती का बदला लेने के लिए अब मार्फतिया एक नई साजिश रचता है। वह धोखे से वज्र कवच के फॉर्मूले का पेटेंट करवा लेता है। पूरन और काला किस तरह उसकी इस साजिश को नाकाम करते हैं, यही इस फिल्म की कहानी है।

फिल्म में कॉमेडी, एक्शन और रोमांस का तड़का

इस शृंखला की सबसे बड़ी खूबी थी कॉमेडी, एक्शन और रोमांस का तड़का। इनमें से किसी भी मामले में यह फिल्म खरी नहीं उतरती। न हंसाती है, न इसका रोमांस महसूस होता है और न इसके एक्शन में कोई रोमांच या नयापन है। फिल्म में सनी, बॉबी और धर्मेंद्र अपनी छवि के अनुरूप किरदारों में ही नजर आए हैं। सनी देओल ने चलते ट्रक को रोका है, मुक्के मारकर धरती हिलाई है। बॉबी ने अपने पापाजी के ऐतिहासिक ‘सुनो गांववालो’ सीन को दोहराया है। फिल्म में धर्मेंद्र का किरदार वैसे तो एक वकील का है, पर उनकी हरकतें किसी मसखरे से कम नहीं हैं। रंगी हुई मूछों के साथ काल्पनिक अप्सराओं से बतियाते धर्मेंद्र कुछ खास नहीं जमते। सनी को यह समझना चाहिए कि अगर वह अपनी एक्शन छवि के मुताबिक ही फिल्में करना चाहते हैं तो भी अब एक्शन का स्वरूप बहुत बदल चुका है। अभिनय में बाजी मार ले गए हैं बॉबी देओल। रेस 3 की सफलता के बाद वह पूरे फॉर्म में नजर आ रहे हैं।

फिल्म में कृति खरबंदा की भी एक विशेष भूमिका है। उनकी मौजूदगी से ग्लैमर आता है। उन्होंने काम भी ठीक किया है। असरानी, शत्रुघ्न सिन्हा, सलमान खान जैसे कलाकारों ने भी फिल्म में कैमियो रोल किए हैं। शत्रुघ्न और धर्मेंद्र के कुछ संवाद मजेदार हैं। संगीत में याद रखने जैसा कुछ नहीं है। आजकल के चलन को देखते हुए इसमें भी एक हिट गीत ‘राफ्ता-राफ्ता’ का रीमिक्स रखा गया है।